जनरल डब्बा

जो होता आ रहा है इसके मुसाफिरों के साथ (सौरभ के.स्वतंत्र)

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कही ये बसंत तो नहीं!

Posted On: 28 Oct, 2011 में

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आज आसमान सागर है

या सागर आसमान,

आज हवा सर्द है

या सर्द हवा है,

आज पात्तियां जामीन पर हैं

या जमीं ही डाल पर,

आज मुस्कराहट होठ पर

या होठ मुस्कराहट में सराबोर,

आज खुशियाँ दिल में हैं

या दिल ही खुशियों में,

आज जन्नत कदमों  में

या ह़र कदम जन्नत की तरफ..

पता नहीं क्यों

आज

ऐसा सुखद अहसास हो रहा

कि मै तुम हो

तुम मै!

कही ये बसंत तो नहीं

या मै कोई महंत तो नहीं,

प्रकृति का ये सुन्दर रूप!

आज मै रकम-रकम

की पत्तियां, मुस्कराहट, खुशियाँ,

मौसम और प्यार

इकठ्ठा कर रहा हूँ

ताकि आने वाली पीढ़ी

को दे सकू इतने सारे प्यार,

मैंने आज पेड़ लगाया है!

तुम भी लगा के देखो तो जरा;

तुम भी बन जाओगे

इन खजानों के मालिक!

- सौरभ के.स्वतंत्र

डालडाल

www.hamarivani.com

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Lahar के द्वारा
October 29, 2011

अच्छी रचना

    balaji के द्वारा
    November 7, 2011

    लाजवाब,बेहतरीन-लगे रहॊ सौरभ भाई

abodhbaalak के द्वारा
October 29, 2011

सुन्दर रचना सौरभ जी, आशा है की आगे भी आपसे ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

sunil kumar के द्वारा
October 29, 2011

बिम्बों का सही प्रयोग अच्छी लगी

November 7, 2011

Dhanyavad!


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